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Kaviguru जयंती पर विशेष : रविंद्रनाथ टैगोर और रेल यात्रा

बंगाल मिरर, आसनसोल : कितने ही पहाड़ियों और नदी तटों पर
इस छोटी सी बांसुरी ले,
बजाया है नई धुनों की सांस”- रवींद्रनाथ ठाकुर के ‘गीतांजलि’ के इन शब्दों में शायद भारतीय रेल का प्रतिबिंब है, जिसका नेटवर्क इस देश के विभिन्न प्राकृतिक संपदा, वनस्पतियों, जीवों और विभिन्न संस्कृति के लोगों को एक जीवन रेखा में पिरों कर निरंतर सहेजता सवाँरता चला जाता है। महान कवि और नोवेल पुरस्कार विजेता, रवींद्रनाथ ठाकुर का इस रेलवे के साथ उनके 11 साल 9 महीने की उम्र से अर्थात 14 फरवरी 1873 से , उनकी अंतिम यात्रा अर्थात 25 जुलाई 1941 तक बोलपुर से हावड़ा तक उनके इस जीवन सफर में एक सुखद जुड़ाव रहा।



ठाकुर परिवार का भी भारत में रेलवे के साथ घनिष्ठ संबंध रहा क्योंकि रवींद्रनाथ के दादाजी प्रिंस द्वारकानाथ ठाकुर एक उद्योगपति थे, जिनके पास रानीगंज के निकट कई कोयला खदानें थीं। वे 1843 में इंग्लैंड में रेलवे को देखकर इतने प्रभावित हुए कि वे अपने कोयला खदान में एक रेलवे लाइन बनाना चाहते थे। उन्होंने मुख्य रूप से रानीगंज और राजमहल कोलफील्ड्स से कृषि और खनिज उत्पादों की आवाजाही के लिए ग्रेट वेस्टर्न बंगाल रेलवे कंपनी नामक एक कंपनी की स्थापना की। इस बीच आर मैकडॉनल्ड स्टीफेंसन ने पहले ही इंग्लैंड में निगमित ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी के लिए शेयर जारी कर दिए थे। लाइन के निर्माण की अनुमति लेने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को राजी करने के लिए इंग्लैंड में द्वारकानाथ के प्रयास तब विफल हो गए जब उनकी योजना को कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ऑफ ईस्ट इंडिया कंपनी ने खारिज कर दिया क्योंकि वे स्थानीय प्रबंधन के तहत एक कंपनी को इस तरह के एक महत्वपूर्ण रेलवे लाइन के निर्माण की अनुमति नहीं देना चाहते थे।



कहा जाता है कि जब रवींद्रनाथ 11 साल और 9 महीने के थे तब उन्होने पहली बार ट्रेन से यात्रा की थी। 14 फरवरी 1873 को हावड़ा से बोलपुर तक आधे टिकट पर उन्होंने यात्रा की थी। विडंबना यह है कि रवींद्रनाथ की अंतिम यात्रा भी उन्हीं दो स्टेशनों के बीच थी। 25 जुलाई 1941 को उनकी मृत्यु से ठीक दो सप्ताह पहले बोलपुर से हावड़ा उनकी अंतिम यात्रा रही।



ईस्ट इंडिया रेलवे के तत्कालीन मुख्य परिचालन अधीक्षक, निबरन चंद्र घोष ने कवि के लिए अपना सैलून ईआईआर 2377 प्रदान किया और उनके साथ बोलपुर से हावड़ा तक गए। सैलून पाकुड़ पैसेंजर ट्रेन से जुड़ा हुआ था और दोपहर 2:40 बजे हावड़ा पहुंचा। यह रवींद्रनाथ ठाकुर की अंतिम यात्रा होनी थी।

सैलून का नवीनीकरण किया गया है और बोलपुर स्टेशन भवन के पास “चिरंतनी” में उसी स्थिति में संरक्षित है।

बैसाख के 25वें दिन रवींद्रनाथ ठाकुर की जयंती के उपलक्ष्य में पूर्व रेलवे परिवार एक बार फिर इस महान कवि की स्मृति में शीश नवाता है। गुरुदेव की अंतिम यात्रा को इस रेलवे द्वारा आज भी याद किया जाता है क्योंकि यह रेलवे बिरादरी के मानस के गहरे कोने में सन्निहित है, जिसे रवींद्रनाथ के शब्दों में सबसे अच्छी तरह व्यक्त किया जा सकता है “पथरीले राह के अंत, निःशब्द एकांत भूमि में मेरे मित्र बिल्कुल अकेले बैठे है। उसे प्रताड़ित न करो। जागो, ओ जागो!

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