“जीने दो !..”
*”जीने दो !..”*”मऊ गाँव की सुबह बड़ी सधी हुई थी।मंदिर की घंटी और मस्जिद की अज़ान लगभग एक ही समय हवा में घुल जाती थीं। खेतों में ओस चमकती, बैलगाड़ियों की चरमराहट और बच्चों की हँसी—सब मिलकर गाँव को ज़िंदा बनाते थे।चौपाल के पुराने पीपल के नीचे राम रोज़ की तरह बैठा था। उसके हाथ में मिट्टी की कुल्हड़ में चाय थी और आँखों में एक ठहराव।श्याम तेज़ कदमों से आया।श्याम (झुँझलाकर):“राम काका, अब मुझसे नहीं सहा जाता। हर कोई मुझे बताने लगता है कि मुझे क्या करना चाहिए।”राम ने चाय का घूँट लिया, मुस्कराया।“किसने क्या कहा?”श्याम:“पिताजी कहते हैं—खेती ही कर।गाँव वाले कहते हैं—शहर मत जा।दोस्त कहते हैं—सरकारी नौकरी पकड़।और मैं… मैं खुद नहीं जानता मैं क्या चाहता हूँ।”राम ने पीपल की ओर देखा।“तो आज पहली बार खुद से पूछ।”उसी समय रहीम और राधा भी चौपाल पर आ गए। नसीरीन थोड़ी दूरी पर खड़ी थी—गाँव की नज़रों से बचती हुई।











राम ने सबको देखा और बोला—राम:“एक बात समझ लो।” दूसरों को वही करने दो जो वे करना चाहते हैं,और अपने जीवन के केंद्र में खुद को रखो।”रहीम (हैरानी से):“लेकिन राम भाई, अगर हम दूसरों को करने देंगे तो लोग हमें कमज़ोर समझेंगे।”राम हँसा।“कमज़ोर वह होता है जो हर किसी की रस्सी से बँधा रहता है।”राधा:“तो क्या किसी की बात सुनना ही नहीं चाहिए?”राम:“बात सुनो, पर मन मत गिरवी रखो।”रहीम ने गहरी साँस ली।“मैं सालों से अपने भाई को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। वह शराब छोड़ दे, ठीक से खेती करे… लेकिन वह सुनता ही नहीं।”राम ने सीधा कहा—राम:“क्योंकि तुम ‘नियंत्रण के भ्रम’ में जी रहे हो।”श्याम:“नियंत्रण का भ्रम?”राम:“हाँ।हम सोचते हैं कि हम दूसरों के फैसले बदल सकते हैं।पर सच यह है—हम सिर्फ खुद को थका सकते हैं।”नसीरीन पहली बार बोली—नसीरीन:“तो क्या गलत होते देख कर भी कुछ न करें?”राम ने उसकी ओर देखा, आवाज़ नरम थी—राम:“करो।पर परिणाम छोड़ दो।यही फर्क है कोशिश और नियंत्रण में।”गाँव नसीरीन को पसंद नहीं करता था।उसकी पढ़ाई, उसका आत्मविश्वास, उसका सवाल पूछना—सब लोगों को खटकता था।एक दिन पंचायत में किसी ने कहा—“लड़की ज़्यादा बोलने लगी है।”नसीरीन घर आकर रो पड़ी।नसीरीन:“राम चाचा, लोग मुझे जीने ही नहीं देते।”राम ने कहा—“तो उन्हें करने दो।और तुम… खुद को जीने दो।”नसीरीन:“लेकिन लोग क्या कहेंगे?”राम की आवाज़ पहली बार सख़्त हुई—“लोग कुछ न कुछ कहेंगे ही।अगर उनकी ज़ुबान बंद करनी है तो अपनी आत्मा को मत चुप कराओ।”राधा स्कूल में पढ़ाती थी। हर किसी के लिए उपलब्ध। हर किसी की उम्मीद।एक दिन वह बोली—“मैं थक गई हूँ, राम जी। सबके लिए जीते-जीते।”राम ने पूछा—“और खुद के लिए?”राधा चुप।राम:“अब ‘मुझे करने दो’ कहना सीखो।”राधा:“मतलब?”राम:“मतलब—मुझे अपनी सीमाएँ तय करने दो।मुझे ‘ना’ कहने दो।मुझे खुद को चुनने दो।”राधा की आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर राहत।श्याम ने शहर जाने का फैसला किया।गाँव में हंगामा मच गया।पिता:“लोग क्या कहेंगे?”श्याम (शांत स्वर में):“कहने दीजिए।”वह राम के पास आया।श्याम:“डर लग रहा है।”राम:“डर ठीक है।पर डर के कारण अपने फैसले दूसरों को मत सौंपो।”रहीम ने पहली बार अपने भाई से कहा—रहीम:“मैं तुम्हें समझा चुका हूँ।अब तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी ज़िम्मेदारी।”भाई चौंका।रहीम को हल्का लगा।समय बीतता गया।श्याम शहर में संघर्ष करता रहा, पर खुश था।राधा ने अतिरिक्त काम से मना करना सीख लिया।नसीरीन ने प्रतियोगी परीक्षा दी।रहीम ने अपने मन को शांत करना सीख लिया।और राम…राम वही था।एक शाम चौपाल पर सब इकट्ठा थे।नसीरीन:“राम चाचा, आपने हमें क्या सिखाया?”राम मुस्कराया—राम:“बस इतना—”दूसरों को जीने दो,ताकि तुम खुद भी जी सको।”यह कहानी सिखाती है—-दूसरों को नियंत्रित करना छोड़ना कमजोरी नहीं, शक्ति है -“उन्हें करने दो” से तनाव जाता है -“मुझे करने दो” से आत्मसम्मान आता है -सीमाएँ बनाना स्वार्थ नहीं, आत्म-रक्षा हैमऊ गाँव आज भी वही है,पर कुछ लोग अब सच में जीने लगे हैं।”✍️ “सुशील कुमार सुमन”अध्यक्ष, आईओसेल आईएसपी, बर्नपुर*#सुशीलकुमारसुमन**#युवा*


