IOA ने वरिष्ठ चिकित्सकों को दी विदाई
*”एक अजीब-सी शाम : जब डॉक्टर भगवान से भी बड़े लगे”*”कल की शाम कुछ अलग थी। कुछ-कुछ *“पूस की रात”* जैसी—धुंधली, ठंडी और मन के भीतर तक उतरती हुई। कभी डर था, कभी एक गहरा-सा खालीपन, और बार-बार यही सवाल कि अब क्या होगा?कारण साफ़ था—हमारे *तीन धुरंधर डॉक्टरों का सेवानिवृत्त होना।**माननीय डॉ. ए. के. झा सर, डॉ. नसीम आज़म सर और डॉ. पूर्णिमा सिन्हा पाल मैडम।*उनका विदाई समारोह *डॉ. पांडे सर* के सधे और संवेदनशील संचालन में चल रहा था, लेकिन मेरे मन में यादों की एक फिल्म चल रही थी। मुझे अपना वह दिन साफ़-साफ़ याद आ रहा था, जब *एक भयानक कार दुर्घटना* में मेरी दोनों टाँगें टूट गई थीं। उस दिन पहली बार सच-मुच समझ आया कि डॉक्टरों को भगवान क्यों कहा जाता है।*डॉ. ए. के. झा सर* की दवाओं की सटीक समझ और स्पष्ट स्पेसिफिकेशन, *डॉ. नसीम आज़म सर* का वह अटूट भरोसा—“सुशील, तुम फिर चलोगे”—और उसी कठिन समय में मेरी पत्नी की तबीयत को लेकर डॉ. पूर्णिमा मैडम की सतत देखरेख… पूरा दृश्य जैसे मन में घूमता रहा।














वह शाम सिर्फ़ एक फेयरवेल नहीं थी, वह जीवन की पुनरावृत्ति थी।फिर डॉ. पांडे सर ने जब इनके जीवन और कार्य-यात्रा की झलकियाँ साझा कीं, तो मन स्वतः ही श्रद्धा से भर उठा।*”डॉ. ए. के. झा सर”* —1 नवंबर 1965 को दरभंगा, बिहार में जन्म। पिता की विभिन्न जिलों में पोस्टिंग के कारण बचपन और शिक्षा बिहार के कई शहरों में हुई।छपरा, गया, मुज़फ्फरपुर, बेगूसराय और समस्तीपुर से होती हुई यह यात्रा ए. एन. मगध मेडिकल कॉलेज, गया से MBBS और दरभंगा मेडिकल कॉलेज से जनरल मेडिसिन में MD तक पहुँची। IGIMS पटना में कार्डियोलॉजी विभाग में सीनियर रजिस्ट्रारशिप ने उनके अनुभव को और निखारा।1 अक्टूबर 2004 को IISCO में सेवा आरंभ कर, ISP SAIL में स्थानांतरण के बाद वे कंसल्टेंट इन मेडिसिन से CMO (M&HS) तक पहुँचे—यह पद नहीं, सेवा की ऊँचाई थी।
*डॉ. नसीम आज़म सर,*अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से MBBS, BSL अस्पताल से सेवा आरंभ, बोकारो जनरल हॉस्पिटल से FRCS और फिर बर्नपुर हॉस्पिटल में ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ के रूप में योगदान। उन्होंने न जाने कितने टूटे शरीरों के साथ-साथ टूटे हौसलों को भी जोड़ने का काम किया।*डॉ. पूर्णिमा सिन्हा पाल मैडम* की कहानी तो ज्ञान, संस्कार और वैश्विक अनुभव का संगम है।छठी तक की पढ़ाई जर्मनी और नीदरलैंड्स में, फिर कल्याणी यूनिवर्सिटी स्कूल। पिता—बायोकेमिस्ट्री के प्रोफेसर और HOD, जिन्होंने मैक्स प्लैंक और लीडन जैसी विश्व-प्रसिद्ध यूनिवर्सिटीज़ में काम किया। माता—दर्शनशास्त्र में MA, शिक्षिका और कोलकाता की प्रतिष्ठित दख़िणी रवींद्रसंगीत परंपरा से जुड़ी हुई।जादवपुर यूनिवर्सिटी की केमिकल इंजीनियरिंग छोड़कर 1984 में RG Kar से MBBS, दो बार डिस्ट्रिक्ट टॉपर, 1982 में छात्राओं में द्वितीय स्थान और तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु द्वारा सम्मान।कोविड काल में उनका समर्पण अविस्मरणीय रहा—जैसे जीवन की आख़िरी दीवार बनकर खड़ी रहीं।कोविड के अँधेरे दौर में इन तीनों का योगदान केवल ड्यूटी नहीं, सेवा-धर्म था।कल की शाम विदाई की नहीं थी—वह कृतज्ञता की शाम थी।ऐसे चिकित्सकों को विदा नहीं किया जा सकता; वे स्मृतियों, विश्वास और जीवन में हमेशा बने रहते हैं।धन्यवाद सर… धन्यवाद मैडम।आपका योगदान हमारे लिए अमूल्य है।*सादर,*सुशील कुमार सुमनप्रेसिडेंट, IOA


