ASANSOL-BURNPURReader's Corner

“बर्नपुर फाइल्स” (स्मृति, विज्ञान और प्रतिशोध की एक भयावह कथा)

“2013 का वर्ष था। बर्नपुर स्टील सिटी अपनी भट्ठियों की आग, शिफ्ट बदलती सायरनों और पिघलते लोहे की चमक में रोज़ की तरह धड़क रही थी। इसी शहर में, स्टील मेल्टिंग शॉप के वरिष्ठ विशेषज्ञ नागेश्वर सिंह की ज़िंदगी एक झटके में बदल गई। एक साधारण-सी कार दुर्घटना—परिणाम असाधारण। उनका एक पैर हमेशा के लिए निष्क्रिय हो गया। चलना अब बैसाखियों के सहारे था; प्लांट की नौकरी, जो कभी उनकी पहचान थी, छूट गई।

नागेश्वर सिंह का सपना कभी और ऊँचा था। उन्होंने आईएएस के लिए कई बार इंटरव्यू दिए थे—हर बार अंतिम चरण तक पहुँचे, पर चयन की रेखा पार न कर सके। विज्ञान, तर्क और अनुशासन—सब उनके भीतर था, पर किस्मत ने उन्हें दूसरी दिशा में मोड़ दिया। बर्नपुर के अपने घर में, किताबों और फाइलों के बीच, वे अब भी दिमाग़ से उतने ही तेज़ थे—शायद पहले से भी अधिक।

उसी समय, आसनसोल में एक नई आईएएस अधिकारी भारती मीणा ने कार्यभार संभाला था। वर्ष 2006 की एक पुरानी रेलवे पटरी के पास, ज़मीन में दफन एक विकृत शव मिला। दृश्य इतना भयावह था कि पुलिस की अनुभवी आँखें भी ठिठक गईं। शव के पास अजीब-से संकेत थे—जैसे किसी ने जानबूझकर पहेली छोड़ी हो। भारती मीणा को याद आया—नागेश्वर सिंह। उनके बैचमेट। *2004 में एनआईटी जमशेदपुर,* दोनों ने साथ पढ़ाई की थी। डीएनए तकनीक, पैटर्न रिकग्निशन और फॉरेंसिक लॉजिक—इन सब में नागेश्वर की पकड़ असाधारण थी।




भारती ने उनसे संपर्क किया। लाइव वीडियो/ऑडियो फीड के ज़रिए, नागेश्वर अपने बर्नपुर वाले घर से ही अपराध स्थल को “देख” रहे थे। उन्होंने संकेतों को पढ़ा—रेत पर पड़े जूते के निशान, तार की गांठ, और एक कागज़ का फटा टुकड़ा। उनका निष्कर्ष साफ़ था—यह दृश्य रचा गया है। कोई खेल खेल रहा है। भारती, जो खुद तेज़-तर्रार और अनुशासित अधिकारी थीं, नागेश्वर की विश्लेषण क्षमता से प्रभावित हुईं। प्लांट की नौकरी भले छूट गई हो, पर एक नया मोर्चा खुल गया था।

असल में, नागेश्वर और भारती—दोनों 2004 एनआईटी जमशेदपुर बैच के साथी—एक-दूसरे को बखूबी जानते थे। कॉलेज के दिनों की हँसी, बहसें, और वह एक पुरानी कहावत—“बहुत होशियार बन रहे हो, कान काट लेंगे”—जो मज़ाक में कही जाती थी—अब अजीब-सी तरह लौट आई थी।


एक दिन, नागेश्वर *बर्नपुर क्लब के स्विमिंग पूल* के पास टहल रहे थे। उन्होंने देखा—एक चिट्ठी असामान्य ढंग से जंपिंग बोर्ड के पास फँसी हुई थी। मन में शंका उठी। उन्होंने तुरंत क्लब के बड़े बाबू को फोन किया। पानी खाली कराया गया—और सच सामने आया। एक युवती, मुँह में कपड़ा ठूँसा हुआ, हाथ-पैर रस्सियों से बँधे—पूल में फेंकी गई थी। सबसे भयावह बात—एक कान गायब था।


हत्यारा टैक्सी ड्राइवर का वेश धारण कर शहर में घूमता रहता था। वही हत्यारा, नागेश्वर और भारती—दोनों से कभी-कभार मिलता भी रहा—सामान्य, दोस्ताना बातचीत के बीच। उसी दौरान, विवाहित दंपति रुबिना और लोकेश का अपहरण हुआ। आसनसोल रेलवे स्टेशन पर लोकेश का शव मिला। रुबिना जीवित थी—एक स्टीम जंक्शन पर बँधी हुई। रेलवे पटरी के पास मिले सुरागों—खासतौर पर कागज़ के फटे टुकड़े—के आधार पर नागेश्वर ने ठिकाना पहचाना। टीम पहुँची—पर देर हो चुकी थी। खुली भाप की पाइप से झुलसकर रुबिना की मौत हो चुकी थी।


घटनास्थल पर भारती को लोकेश के कान का एक टुकड़ा और कागज़ का दूसरा फटा हिस्सा मिला। नागेश्वर ने सबूत जुटाने के लिए लोकेश के हाथ काटने का सुझाव दिया—पर भारती ने इनकार कर दिया। नैतिकता और संवेदना ने उसे रोक दिया। वह गुस्से में वहाँ से चली गई।
राज्य सरकार की छवि पर सवाल उठे। दबाव बढ़ा। परिणाम—भारती मीणा का तबादला झारखंड, जमशेदपुर।
पर हत्यारा रुका नहीं।


जमशेदपुर विमेंस कॉलेज की एक छात्रा का अपहरण हुआ। आज़ादनगर के एक जर्जर बूचड़खाने में उसे खंभे से बाँध दिया गया—खुला घाव, ताकि चूहे आकर्षित हों। पहले छोड़े गए संकेतों के आधार पर भारती और उनकी टीम पहुँची—पर छात्रा की मौत हो चुकी थी। चूहों ने शरीर को बुरी तरह क्षत-विक्षत कर दिया था। एक और कागज़ का टुकड़ा। एक और कान का हिस्सा।

नागेश्वर को खबर दी गई। जाँच का तनाव, दूरी, और नौकरशाही—सबने उनके स्वास्थ्य को हिला दिया। बर्नपुर अस्पताल के डॉ. पांडे—जो उनकी देखभाल कर रहे थे—ने भारती को बताया कि नागेश्वर को डर है—दौरे पड़ सकते हैं, जो स्थायी लकवे में बदल जाएँ। इसी भय ने उन्हें आत्महत्या की ओर धकेल दिया था।

कागज़ के टुकड़ों को जोड़ते हुए, दोनों को कॉलेज की वही पुरानी कहावत याद आई—“बहुत होशियार बन रहे हो, कान काट लेंगे।” पैटर्न स्पष्ट हुआ। अगला शिकार—एक दादा और उसकी पोती। स्थान—एनआईटी जमशेदपुर के पास एक पानी की टंकी। टीम समय पर पहुँची। बच्ची बच गई—दादा नहीं। मौके से मिला—एक और कान का टुकड़ा, एक पुराना पुलिस बैज का हिस्सा, और एक सबवे का नक्शा। रुबिना की मौत के स्थान पर छोड़ा गया एस्बेस्टस—सब मिलकर संकेत दे रहे थे—टाटा रेलवे स्टेशन का परित्यक्त सबवे। एक डिब्बे पर छेड़छाड़ किए गए अंकों से—नागेश्वर का पुलिस बैज नंबर उकेरा गया था।


*नई आसनसोल आईएएस अधिकारी धृति वर्मा* जाँच रोकने के इरादे से नागेश्वर के घर पहुँचीं। उसी रात—हत्यारा फिर सक्रिय हुआ। डॉ. पांडे की हत्या कर दी गई।


सच सामने आया।
हत्यारा जगदीश चंद्र—नागेश्वर का एनआईटी जमशेदपुर का टॉपर बैचमेट—असल नाम मंगल पांडे। कभी डीआरडीओ का वैज्ञानिक। प्रतिभाशाली—पर भटका हुआ। एक लेख—जो नागेश्वर ने लिखा था—और भारती की जाँच—इन दोनों ने मिलकर मंगल द्वारा गढ़े गए सबूतों का पर्दाफाश किया था। छह निर्दोष लोग जेल गए—एक ने आत्महत्या की। मंगल को सज़ा मिली। जेल की यातनाएँ—और उसकी अपनी भ्रांति—सबने मिलकर उसे राक्षस बना दिया। वही कहावत—कॉलेज के दिनों में—अक्सर मंगल ही कहा करता था— *“बहुत होशियार बन रहे हो, कान काट लेंगे।”*

अब वह “खेल” खेल रहा था—नागेश्वर की बुद्धि की परीक्षा—और अंत में, उसे मारने की योजना।

आमना-सामना हुआ।
नागेश्वर—बैसाखियों के सहारे—खड़े थे। मंगल ने वार किया। नागेश्वर ने अपनी बैसाखियों से उसका हाथ कुचल दिया—और आख़िरी कोशिश में—दाँतों से उसकी गर्दन पर काट लिया। मंगल बुरी तरह घायल हुआ—पर नागेश्वर भी असहाय थे। अंतिम वार होने ही वाला था—
तभी धृति वर्मा पहुँचीं। एक गोली। खेल ख़त्म।


आने वाले नए साल में—नागेश्वर ने आत्महत्या का विचार त्याग दिया। वे अपनी बहन सपना—जो जमशेदपुर में रहती थीं—और भारती मीणा से मिलने गए। नए साल की रात—एनआईटी जमशेदपुर के पास वही पानी की टंकी। ठंडी हवा। पुरानी यादें। हँसी। मौन।
नागेश्वर ने कहा,
“कभी-कभी, होशियार होना काफ़ी नहीं होता… ज़िंदा रहना भी एक विज्ञान है।”

भारती मुस्कुराईं।
और अँधेरे में—एक भयावह कहावत—आख़िरकार—खामोश हो गई।


*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Hey there! Ask me anything!