“आखिर !..सच क्या है?”**”क्या सचमुच, सच के आगे CM पद है”
*”आखिर !..सच क्या है?”**”क्या सचमुच, सच के आगे CM पद है”*”लोकतंत्र का यह रूप आज बड़ा अजीब, असहज और बेचैन करने वाला प्रतीत हो रहा है। जिस लोकतंत्र को हमने किताबों में पढ़ा था—“Democracy: of the people, for the people, by the people”—आज वही मानो विकृत होकर“for” के बदले far people,“of” के बदले off people,और “by” की जगह bye-bye peopleमें बदलता जा रहा है।Now Democracy is..*“Democracy OFF the people, FAR the people, BYE-BYE the people”*सच में, ऐसा लगता है कि हम लोकतंत्र के केंद्र में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के किनारे खड़े हैं—जहाँ से गिरने का खतरा हमेशा बना रहता है।














*एक घटना, कई सवाल*
गुरुवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उस समय अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गईं, जब वे चुनावी रणनीति बनाने वाली संस्था I-PAC के प्रमुख प्रतीक जैन के कोलकाता स्थित आवास पर स्वयं पहुँच गईं। संयोग नहीं, बल्कि खास बात यह थी कि उसी समय वहाँ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी चल रही थी।मुख्यमंत्री के पहुँचने से कुछ ही मिनट पहले मनोज वर्मा, कोलकाता पुलिस कमिश्नर, भी मौके पर मौजूद थे। ममता बनर्जी लगभग 20–25 मिनट तक अंदर रहीं और बाहर निकलते समय उनके हाथ में एक हरे रंग की फाइल दिखाई दी। यही दृश्य इस पूरे मामले को केवल एक कानूनी कार्रवाई से आगे ले जाकर एक गहरे राजनीतिक प्रतीक में बदल देता है।
*आरोपों की राजनीति*
बाहर आकर ममता बनर्जी ने तीखे शब्दों में आरोप लगाया कि ED की यह कार्रवाई राजनीतिक रूप से प्रेरित है। उनके अनुसार, इसका उद्देश्य तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आंतरिक दस्तावेज़, हार्ड डिस्क और संवेदनशील डिजिटल डेटा को जब्त करना है।उन्होंने कहा कि प्रतीक जैन उनके “आईटी सेल के प्रभारी” हैं और यह छापा लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास है।
मुख्यमंत्री के प्रमुख आरोप थे—*1) यह कार्रवाई असंवैधानिक है,**2) विपक्षी दलों को डराने और चुप कराने की कोशिश है,**3) चुनाव से पहले केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है।*वहीं ED का कहना है कि तलाशी कानून के दायरे में और चल रही जाँच का हिस्सा है।सच की परतेंयहीं से सवाल और गहरे हो जाते हैं।अगर जाँच पूरी तरह कानूनी है, तो किसी राज्य की मुख्यमंत्री का मौके पर जाकर हस्तक्षेप करना क्या संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप है?और यदि कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है, तो क्या केंद्रीय एजेंसियों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सच में सुरक्षित है?यह टकराव किसी एक दल या एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक सच की ओर इशारा करता है, जहाँ*केंद्र बनाम राज्य,**सत्ता बनाम विपक्ष,**और एजेंसी बनाम राजनीति*एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं।
लोकतंत्र की असली कसौटी
लोकतंत्र की मजबूती न तो केवल सरकार से आती है और न ही केवल विरोध से। उसकी असली ताकत होती है—*संविधान, संस्थाओं की स्वतंत्रता, और जनता का विश्वास।*जब जाँच एजेंसियाँ राजनीति का औज़ार समझी जाने लगें और निर्वाचित नेता जाँच प्रक्रिया में सीधे उतर आएँ, तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगाने लगता है।*अंत में, एक याद दिलाना*यह मामला सिर्फ एक छापेमारी या एक मुख्यमंत्री की मौजूदगी का नहीं है। यह उस बड़े सवाल का प्रतीक है—हम लोकतंत्र की रक्षा कर रहे हैं या उसे अपने-अपने हितों के अनुसार मोड़ रहे हैं?और नेताओं को एक बात याद रखनी ही होगी—*“कोई लाख करे चतुराई रे,**करम का भेद मिटे न रे भाई।”*सत्ता बदल सकती है, रणनीतियाँ बदल सकती हैं, पर कर्म और लोकतंत्र का हिसाब देर से सही, पर चुकाना ज़रूर होता है।*
✍️ सुशील कुमार सुमन*अध्यक्ष, IOAसेल, आईएसपी, बर्नपुर*#सुशीलकुमारसुमन**#युवा*
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