Reader's Cornerसाहित्य

“शायद !.. अब भी ज़िंदा हूँ”

✍️ “सुशील कुमार सुमन”अध्यक्ष, आईओसेल आईएसपी, बर्नपुर*#सुशीलकुमारसुमन**#युवा* “शायद !.. अब भी ज़िंदा हूँ… राजीव ने यह पंक्ति अपनी डायरी के पहले पन्ने पर उस दिन लिखी थी, जब सूरत की कड़ाके की ठंड उसके सीने में देसी सर्द हवाओं जैसा दर्द भर रही थी। झारखंड के गोड्डा ज़िले के गाँव बहुरिया से हज़ारों मील दूर बैठा वह एक छोटी-सी चाय की दुकान पर कुल्हड़ की गर्मी से हाथ सेंकते हुए उस वक़्त खुद में लौटने की कोशिश कर रहा था। उसके सामने धुआँ उठती चाय, पीछे भागती फैक्ट्री की बसें, और बीच में एक अधूरी-सी ज़िंदगी — जैसे आधे खुले प्रकाश में पड़ा कोई पुराना एल्बम। वह सोचता है, क्या मैं वाकई ज़िंदा हूँ? या बस सांसें भरने का यह खेल खेल रहा हूँ? कुल्हड़ का पहला घूँट भीतर उतरते ही यादों के दरवाज़े खुल जाते हैं — उसकी माँ देवकी की वह हल्की-सी पुकार, जिसमें प्यार और चिंता दोनों मिला करते थे। पिता सुभाष का वह सख़्त स्वर, जिसके पीछे चट्टानों जैसे नियम और पानी जैसी नरमी छिपी रहती थी। पत्नी मीरा का वह स्थिर और शांत चेहरा, जो उसकी थकान को छूते ही पिघल जाता था। दो बेटों रोहन और सोहन की शरारती हँसी, जिनमें उसकी पूरी दुनिया सिमटी हुई थी। पर आज उस दुनिया से वह बहुत दूर था, मानो उसे बस फोन की स्क्रीन का चार इंच का जग दिखता हो।

वह अपनी डायरी खोलता है — वही डायरी, जिसे वह कई सालों से साथ लेकर चल रहा है, पर लिखने का समय शायद कम ही मिलता है। पर आज कुछ भीतर टूट रहा है, और कुछ नया बनने की कोशिश भी हो रही है। वह लिखता है — “यह सफर, मेरे गुज़रे हुए पड़ावों की बिखरी हुई पोटली है। वह सब कुछ जो मैंने अपने कमरे के किसी शेल्फ़ पर पुरानी अख़बार के नीचे छिपा दिया और भूल गया। आज वह सब मुझे पुकार रहा है, जैसे कोई पुराना दोस्त, कोई अधूरी ग़ज़ल, या कोई धूमिल सा सपना।”यादों की पहली परत बचपन से शुरू होती है। वह बहुरिया का छोटा-सा घर, जिसकी दीवारें मिट्टी की थीं और जिसकी छत पर बारिश की बूँदें किसी साज़ की तरह बजती थीं। माँ उसे अक्सर नहलाते हुए कहतीं — “राजू, तुम बड़े होकर अफसर बनोगे।” पिता खेत से लौटते हुए उसके सिर पर हाथ फेरते — “पढ़ना जरूर, नहीं तो ज़िंदगी दुत्कारेगी।” पर बच्चों को क्या ही समझ आता है भविष्य की चिंता? उनके लिए दुनिया मिट्टी के घरौंदों में बसती है। राजीव के लिए भी वही था। वह मिट्टी से खेलता, पेड़ पर चढ़ता, बांसुरी बजाने की कोशिश करता और नदी में पत्थर उछालता। हर सुबह स्कूल की घंटी उसे दुनिया के नियमों से मिलाती, और हर शाम गाँव की पगडंडी उसे फिर उसके सपनों में लौटा देती।

स्कूल की यादें भी किसी फिल्म की तरह चलने लगीं — मास्टरजी की डाँट, दोस्तों के बीच छुपी हुई दोस्ती, मैदान के किनारे रखी स्लेट-खड़िया, और दोपहर के खाने में माँ के हाथों की वह सादी पर स्वाद से भरी रोटी-सब्ज़ी। राजीव हँसता है — “कैसी छोटी-सी दुनिया थी, मगर कितनी बड़ी ख़ुशियाँ देती थी।”पर जीवन कभी एक जगह नहीं ठहरता। वह कॉलेज तक पहुँच गया। कॉलेज… वह तो जैसे किसी नई दुनिया में कदम रख लेना था। वहाँ किताबों के साथ-साथ गाने, शायरी, दोस्ती, बाइक, फिल्में और प्रेम भी था। राजीव के लिए यही जीवन का सबसे चमकदार पड़ाव था। दोस्त हर शाम कैंटीन में जुटते। चाय के गिलासों के साथ राजनीति, क्रिकेट और जीवन की बड़ी बातों पर चर्चा होती।

लड़के–लड़कियों की शरारतें, प्रोफेसरों का तनाव, और सेमेस्टर की भागदौड़ — यह सब मिलकर एक मस्त और रंगीन दुनिया बनाता था।इन्हीं दिनों राजीव को पहली बार प्यार हुआ था। उसने लिखा — “पहला प्यार किसी अनकहे सुर की तरह होता है, जो दिल पर गिरता है और एक नई कविता बना जाता है।” वह लड़की — जिसका नाम वह आज भी डायरी में लिखते हुए काँप जाता है — उसकी मुस्कान राजीव को दुनिया में सबसे मधुर लगती थी। पर जैसे जीवन हर चीज़ को सरल नहीं छोड़ता, वैसे ही उस प्रेम का अंत भी एक दिन टूटन में हुआ।

वह दर्द राजीव को पहली ग़ज़ल सिखा गया — “इश्क़ में टूटकर भी कैसे मुस्कुराया जाता है।”समय गुज़रता रहा। कॉलेज खत्म हुआ। नौकरी की तलाश शुरू हुई। घर में अपेक्षाएँ भी बढ़ीं — पिता बूढ़े हो रहे थे, माँ बीमार पड़ने लगी थीं, छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई का खर्च, और समाज की अनकही अपेक्षाएँ राजीव के कंधों पर चढ़ती चली गईं। वह अपने गाँव से निकलकर पहले राँची, फिर पटना, और अंत में सूरत आ गया। एक नई नौकरी, एक नया शहर, एक नया संघर्ष।सूरत में सब कुछ था — रोशनी, भीड़, मशीनें, फैक्टरियाँ, बड़ी बिल्डिंगें — पर घर जैसा कुछ भी नहीं। किराए का कमरा, घर के खाने की कमी, और दिल में घर की यादों की पीड़ा। मीरा से हुई शादी ने उसके जीवन में एक स्थिरता दी। वह शांत, सहनशील और बहुत समझदार थी। रोहन और सोहन ने घर को फिर से हँसी से भर दिया। पर नौकरी की वजह से राजीव अक्सर दूर रहता। वीडियो कॉल पर बच्चे उँगलियाँ दिखाते, “पापा कब आयेंगे?” और वह जवाब देने में हिचकता — “जल्दी बेटा, जल्दी।”

उसने डायरी में लिखा — “नौकरी दिल को नहीं चलाती, पेट को चलाती है; पर पेट के लिए दिल को रोज थोड़ा-थोड़ा मारना पड़ता है।”आज उसी नौकरी के शहर की ठंड में बैठा वह अपने जीवन के हर पड़ाव को जैसे दोबारा जी रहा था। चाय की भाप के साथ बचपन उठ रहा था, कॉलेज की शरारतें खिल रही थीं, पहला प्यार दिल पर दस्तक दे रहा था, शादी और बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ मन में तैर रही थीं, और बुजुर्ग माँ-पिता की झुर्रियों की छाया उसके भीतर कहीं गहरी उतर रही थी।सूरत की उस चाय की दुकान पर बैठा वह खुद से कहता है — “क्या मैं अब भी वही राजीव हूँ? या समय ने मुझे इतना घिस दिया कि मैं बस जीने की मशीन बनकर रह गया?”कुछ क्षण बाद वह अपनी कलम उठाता है और डायरी में लिखना शुरू करता है

—“ज़िंदगी का यह सफर मेरे भीतर छुपी उन वजहों की तलाश है, जिनके कारण मैं आज भी ज़िंदा हूँ। कभी तुकबंदियाँ मुझे ज़िंदा रखती हैं, कभी बच्चे की हँसी, कभी पत्नी की आवाज़, कभी माँ की दुवाएँ, और कभी किसी पुराने सपने की बचे हुए राख में छिपी चिंगारियाँ। शायद यही वजहें हैं कि मैं अब भी ज़िंदा हूँ… पूरी तरह नहीं, पर अधूरा भी नहीं।”वह लिखते-लिखते ठहरता है। हवा में उठती ठंड की सिहरन चाय की धूप जैसी गर्मी से मिलती है। वह आसमान की तरफ़ देखता है। ऐसा लगता है जैसे समय रुक गया हो। वह मुस्कुराता है। और एक आख़िरी पंक्ति लिखता है —“फिर मुलाक़ात होगी… शायद अभी ज़िंदा हूँ के किसी अगले पड़ाव पर।”और कुल्हड़ का आख़िरी घूँट पीते हुए राजीव को पहली बार लगता है कि हाँ — वह थका हुआ है, टूटा हुआ है, भूला हुआ है, पर फिर भी कहीं गहराई में अब भी ज़िंदा है।”

News Editor

Mr. Chandan | Senior News Editor Profile Mr. Chandan is a highly respected and seasoned Senior News Editor who brings over two decades (20+ years) of distinguished experience in the print media industry to the Bengal Mirror team. His extensive expertise is instrumental in upholding our commitment to quality, accuracy, and the #ThinkPositive journalistic standard.

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