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Holi के संदेश को समझें और हर भूमिका को खुल के जियें

होली ( Holi ) के संदेश को समझें और हर भूमिका को खुल के जियें हिंदू वर्ष के साल के आखिरी महीने की आखिरी पूर्णिमा को होली मनाई जाती है। पूर्णिमा के अगले दिन नववर्ष होता है। इसलिए उस आखिरी पूर्णिमा से पहले, परंपरा है कि सारा पुराना सामान आग में डाल दिया जाए यानी हम सभी तरह की बुराई, अहंकार और नकारात्मक ऊर्जा को पवित्र अग्नि में जलाते हैं और अगले दिन नव वर्ष के आगमन पर रंगों से होली खेलते हुए, उत्सव मनाते हैं।

होली ( Holi ) का संदेश

Holi के संदेश होली सदियों से एक ऐसा त्योहार है, जो सभी वर्गों, जातियों, आयु समूहों और पीढ़ियों के लोगों को एकजुट करता रहा है। हर कोई एक साथ आता है और मानवता की एकता का जश्न मनाता है, और यही होली का संदेश है। होली एक ऐसा त्योहार है जो विविध पृष्ठभूमि और व्यवसायों के लोगों को एकजुट करता है। समाज लोगों को कभी पेशे के आधार पर, कभी लिंग के आधार पर, कभी आयु समूहों के आधार पर विभाजित करता है। होली वह समय है जब हम लिंग, राष्ट्रीयता, जाति और धर्म की इन सभी बाधाओं को तोड़ते हैं – बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक, सभी को गले लगाते हैं और उन पर रंग डालते हैं। यह एक एकीकृत उत्सव है।

जीवन रंगीन बनाएं, उबाऊ नहीं

हमारी भावनाओं और भावनाओं से जुड़े अलग-अलग रंग हैं। क्रोध लाल रंग से, ईर्ष्या हरे रंग से, जीवंतता और खुशी पीले रंग से, प्रेम गुलाबी रंग से, विशालता नीले रंग से, शांति सफेद रंग से, त्याग केसरिया से और ज्ञान बैंगनी रंग से जुड़ा है। प्रत्येक व्यक्ति रंगों का एक फव्वारा है, जो अपना रंग बदलता रहता है। अगर आपकी जिंदगी होली की तरह है, जहां हर रंग साफ नजर आता है, तो यह आपके जीवन में चार चांद लगा देता है। विविधता में सद्भाव जीवन को जीवंत, आनंदमय और अधिक रंगीन बनाता है। होली की तरह, जीवन रंगीन होना चाहिए, उबाऊ नहीं।

Holi के संदेश : रंगो की तरह अपनी अलग-अलग भूमिका को समझे

जब प्रत्येक रंग स्पष्ट रूप से देखा जाता है, तो वह जीवंत होता है। जब सभी रंग मिल जाते हैं, तो आप काले रंग के हो जाते हैं। इसी तरह, हमारे दैनिक जीवन में, हम अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं। प्रत्येक भूमिका और भावना को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की आवश्यकता है। भावनात्मक भ्रम समस्या पैदा करता है। जब आप एक पिता होते हैं, तो आपको पिता की भूमिका निभानी होती है। आप कार्यस्थल पर पिता नहीं हो सकते। जब आप अपने जीवन में भूमिकाओं को मिलाते हैं, तो आप गलतियां करने लगते हैं। जीवन में आप जो भी भूमिका निभाते हैं, उसे पूरी तरह से दें। अज्ञानता में, भावनाएं परेशान करती हैं; ज्ञान में, वही भावनाएं रंग जोड़ती हैं। अपने आप से कहें कि आप अपनी सभी भूमिकाओं के साथ न्याय करेंगे। आप सभी भूमिकाएं निभा सकते हैं: एक अच्छा जीवनसाथी, अच्छा बच्चा, अच्छा माता-पिता और एक अच्छा नागरिक। मान लें कि आप में ये सभी गुण हैं। बस उन्हें खिलने दो।

अब रंगों से नहीं करेंगे परहेज, जान लें होली का वैज्ञानिक महत्व

रंगों का त्योहार होली फाल्गुन महीने में पूर्णिमा के दिन धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार होली मार्च के महीना पड़ता है। हम सभी होली की पौराणिक कथा दैत्य राजा हिरण्यकश्यप और उनके पुत्र प्रहलाद और बहन होलिका की कथा से वाकिफ हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे द्वारा मनाए जाने वाले त्योहारों के पीछे कोई वैज्ञानिक कारण हो सकता है? तो आइए जानते हैं होली के त्योहार के पीछे के वैज्ञानिक कारण…

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होलिका दहन और स्वास्थ्य

होली वसंत ऋतु में खेली जाती है, जो सर्दियों के अंत और गर्मियों के आगमन के बीच का समय है। आम तौर पर इस समय सर्दी से गर्मी की ओर बढ़ते हैं। यह अवधि वातावरण के साथ-साथ शरीर में बैक्टीरिया के विकास को प्रेरित करती है। ऐसे में जब होलिका को जलाया जाता है, तो आसपास के क्षेत्र का तापमान 50-60 डिग्री सेल्सियस के आसपास बढ़ जाता है। परंपरा के अनुसार जब लोग अलाव के चारों ओर परिक्रमा करते हैं, तो अलाव से आने वाली गर्मी शरीर में बैक्टीरिया को मारती है और इसे साफ करती है। देश के कुछ हिस्सों में, होलिका दहन (होलिका जलाने) के बाद लोग अपने माथे पर राख डालते हैं। इसके अलावा आम के पेड़ के नए पत्तों और फूलों के साथ चंदन (चंदन की लकड़ी का पेस्ट) मिलाकर सेवन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह बेहतर स्वास्थ्य रखता है।

होली में राग-रंग का महत्व

वैसे यही वह समय होता है, जब लोगों को सुस्ती का अहसास होता है। वातावरण में ठंड से लेकर गर्म में बदलाव के कारण शरीर को कुछ सुस्ती का अनुभव होना स्वाभाविक है। इस आलस्य को दूर करने के लिए लोग ढोल, मंजीरा और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ गीत (फाग, जोगीरा आदि) गाते हैं। यह शरीर को नई ऊर्जा देता है और फिर से जीवंत करने में मदद करता है। रंगों से खेलते समय उनकी शारीरिक गति भी इस प्रक्रिया में मदद करती है। रंग और अबीर का भी हमारे शरीर पर अनोखा प्रभाव होता है और इससे शरीर को सुकून मिलता है।

होली के रंग और सेहत

मानव शरीर के फिटनेस में रंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी विशेष रंग की कमी से बीमारी हो सकती है, लेकिन उस रंग तत्व को आहार या दवा के माध्यम से पूरक होने पर ठीक किया जा सकता है। प्राचीन काल में जब लोग होली खेलना शुरू करते थे, तो उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले रंग प्राकृतिक स्रोतों जैसे हल्दी, नीम, पलाश (टेसू) आदि से बनाए जाते थे। इन प्राकृतिक स्रोतों से बने रंग के चूर्ण को चंचलता से डालने और फेंकने का मानव शरीर पर उपचार प्रभाव पड़ता है। यह शरीर में आयनों को मजबूत करने का प्रभाव रखते हैं और इसमें स्वास्थ्य और सुंदरता निखरती है।

‘Vocal for Local’ के साथ मनाएं रंगों का त्योहार होली

अबीर, गुलाल और रंगों का त्योहार होली का नाम सुनते ही सभी का मन सराबोर हो जाता है। रंगों के त्योहार में सबके घर-आंगन में रंगों की बरसात हो और खुशियां द्वार पर आए, इस बात का ध्यान हम सभी को मिलकर रखना है।

स्थानीय उत्पादों की करें खरीदी

दरअसल यहां बात वोकल फॉर लोकल की है, हाल ही में मन की बात कार्यक्रम में पीएम मोदी ने भी कहा कि होली हमें एक सूत्र में पिरोने वाला त्योहार है। इसमें अपने-पराए, द्वेष-विद्वेष, छोटे-बड़े सारे भेद मिट जाते हैं। इसलिए कहते है, होली के रंगों से भी ज्यादा गाढ़ा रंग, होली के प्रेम और सौहार्द का होता है। होली में गुजिया के साथ-साथ रिश्तों की भी अनूठी मिठास होती है। इन रिश्तों को हमें और मजबूत करना है और रिश्ते सिर्फ अपने परिवार के लोगों से ही नहीं बल्कि उन लोगों से भी जो आपके एक वृहद् परिवार का हिस्सा है। इसका सबसे महत्वपूर्ण तरीका भी आपको याद रखना है। ये तरीका है – ‘Vocal for Local’ के साथ त्योहार मनाने का। आप त्योहारों पर स्थानीय उत्पादों की खरीदी करें, जिससे आपके आसपास रहने वाले लोगों के जीवन में भी रंग भरे, रंग रहे, उमंग रहे।

कोरोना से सावधानी भी जरूरी

पीएम मोदी ने एक बार फिर त्योहार में कोरोना से सावधान रहने को भी कहा। उन्होंने कहा कि हमारा देश जितनी सफलता से कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है, और, आगे बढ़ रहा है, उससे त्योहारों में जोश भी कई गुना हो गया है। इसी जोश के साथ हमें अपने त्योहार मनाने हैं, और साथ ही, अपनी सावधानी भी बनाए रखनी है।

देसी गुलाल और पिचकारियों बढ़ी मांग

वहीं बता दें कि इस बार बाजार में देसी पिचकारियों की मांग भी बढ़ी है। लोग हर्बल गुलाल की ओर रूख कर रहे हैं। हर्बल गुलाल, रंग से लेकर होली में खाए जाने वाले तरह-तरह के देसीआइटम भी लोगों को खूब भा रहा है। देशभर में स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं के द्वारा तैयार किए गए हैं। इस बीच ट्राइब्स इंडिया भी होली स्पेशल कलेक्शन लेकर आया है। ट्राइब्स इंडिया की वेबसाइट से घर बैठे सामान मंगा सकते हैं। वहीं व्यापारियों की माने तो इस बार बाजार में इस बार उत्साह पिछले सालों की तुलना में काफी ज्यादा है। ग्राहकों ने भी भारतीय उत्पादों को ही खरीद रहे हैं। बाजार में चाइना का तो माल इस बार आया ही नहीं है।

त्वचा के लिए फायदेमंद है हर्बल गुलाल

हर्बल गुलाल बनाने वाली महिलाओं ने बताया कि यह गुलाल त्वचा के लिए फायदेमंद है। इसमें किसी प्रकार का कोई नुकसानदायक या आर्टिफिशियल सामग्री का उपयोग नहीं किया जाता है। झारखंड के धनबाद की महिला मंडली वनोपज एवं फूलों के जरिए प्राकृतिक हर्बल गुलाल तैयार की हैं। प्राकृतिक रूप से तैयार पलाश गुलाल लोगों को काफी पसंद आ रहा है। राज्य के सभी जिलों में स्थित पलाश मार्ट से पलाश प्राकृतिक गुलाल की खरीदारी की जा सकती है।

गेंदा, पलाश और गुलाब के फूलों से तैयार कर रही हैं विभिन्न रंगों के गुलाल

हर्बल गुलाल बनाने के लिए हरे रंग के लिए पालक, गुलाबी के लिए गुलाब के फूल, पीले और भगवा रंग के लिए पलाश एवं गेंदा फूल, लाल रंग के लिए चुकंदर और अन्य रंगों के लिए चंदन सहित अन्य प्रकार के फूल एवं पत्तियों के रंगों का प्राकृतिक रूप से उपयोग किया गया है।

News Editor

Mr. Chandan | Senior News Editor Profile Mr. Chandan is a highly respected and seasoned Senior News Editor who brings over two decades (20+ years) of distinguished experience in the print media industry to the Bengal Mirror team. His extensive expertise is instrumental in upholding our commitment to quality, accuracy, and the #ThinkPositive journalistic standard.

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