सच्ची भक्ति वही है जिसमें छल – अहंकार न हो : आचार्य राजकुमार द्विवेदी
बंगाल मिरर, आसनसोल :आसनसोल में आध्यात्मिक चेतना का संचार करने के लिए भव्य श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया गया है। जालान परिवार (आसनसोल) के तत्वावधान में आयोजित यह सात दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान 18 मई 2026 से शुरू होकर 24 मई 2026 तक चलेगा।इस पावन कथा के मुख्य वाचक सुप्रसिद्ध पूज्य गुरुदेव आचार्य राजकुमार द्विवेदी जी हैं, जिनके मुखारविंद से श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं और श्रीमद् भागवत महापुराण के गूढ़ रहस्यों का श्रवण कर रहे।














आचार्य राजकुमार द्विवेदी ने कहा भारतीय सनातन परंपरा में भक्ति का स्थान सबसे ऊँचा माना गया है। शास्त्रों में अनेक प्रसंग ऐसे मिलते हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि भगवान बाहरी आडंबर, रूप, जाति, विद्या या उम्र नहीं देखते, बल्कि वे केवल सच्चे हृदय और निष्कपट भक्ति को स्वीकार करते हैं। ऐसा ही एक सुंदर संवाद राजा परीक्षित और श्री सुखदेव जी के बीच वर्णित है, जो हमें भक्ति का वास्तविक अर्थ समझाता है।एक बार श्री सुखदेव जी ने राजा परीक्षित से पूछा, “राजन, बताइए भगवान सबसे पहले किसे मिलते हैं?”राजा परीक्षित ने उत्तर दिया, “भगवान शायद उसे मिलते होंगे जो दिन में चार बार स्नान करता है।”तब सुखदेव जी मुस्कुराए और बोले, “यदि केवल बार-बार स्नान करने से भगवान मिलते, तो जंगलों में रहने वाले भीलों और कोल जाति के लोगों को भगवान कभी नहीं मिलते, क्योंकि वे कई-कई महीनों तक स्नान नहीं कर पाते।”यह सुनकर राजा परीक्षित ने कहा, “तो फिर भगवान बड़ी उम्र वालों को मिलते होंगे।”सुखदेव जी ने पुनः समझाया, “यदि भगवान केवल वृद्ध लोगों को मिलते, तो बालक ध्रुव को भगवान के दर्शन कभी न होते। उन्होंने तो छोटी आयु में ही कठोर तप और सच्ची भक्ति से भगवान को पा लिया था।”राजा परीक्षित ने फिर कहा, “तो शायद भगवान सुंदरता देखते होंगे।”सुखदेव जी बोले, “यदि भगवान बाहरी सुंदरता देखते, तो कुब्जा को भगवान श्रीकृष्ण का प्रेम और कृपा कभी प्राप्त न होती, क्योंकि वह तीन स्थानों से टेढ़ी थीं।”
राजा परीक्षित ने अगला प्रश्न किया, “तो भगवान पढ़े-लिखे और विद्वान लोगों को मिलते होंगे।”सुखदेव जी ने उत्तर दिया, “यदि विद्या ही भगवान को पाने का मार्ग होती, तो गजेन्द्र हाथी को भगवान कभी न मिलते। उसने तो केवल सच्चे मन से पुकारा और भगवान तुरंत उसकी रक्षा के लिए आ गए।”तब राजा परीक्षित बोले, “तो क्या भगवान ऊँची जाति वालों को मिलते हैं?”सुखदेव जी ने कहा, “यदि भगवान जाति देखते, तो विदुर जी को भगवान श्रीकृष्ण का स्नेह कभी प्राप्त न होता। विदुर जी तो दासी पुत्र थे, फिर भी भगवान स्वयं उनके घर गए और उनके प्रेम से प्रसन्न हुए।”
अंत में सुखदेव जी ने कहा, “भगवान न स्नान देखते हैं, न उम्र, न रूप, न विद्या और न ही जाति। भगवान केवल भक्ति देखते हैं। वे हृदय की सुंदरता को पहचानते हैं और सच्चे भक्त को ही अपना लेते हैं।”यही कारण है कि हमारे शास्त्रों में कहा गया है —“भक्ति प्रिय माधव” अर्थात् भगवान माधव को सबसे प्रिय केवल भक्ति ही है।सच्ची भक्ति वही है जिसमें छल न हो, अहंकार न हो और केवल प्रेम व समर्पण हो। जब मन निर्मल हो जाता है और हृदय में भगवान के प्रति सच्चा प्रेम जाग उठता है, तब भगवान स्वयं भक्त के जीवन में प्रकट हो जाते हैं।

