Agnimitra Paul का ममता बनर्जी और टीएमसी पर तीखा हमला, कहा बाघ की जगह जंगल या पिंजरे में
बंगाल मिरर, बर्नपुर: रथयात्रा के दिन बर्नपुर में आयोजित दुर्गा पूजा की खूंटी पूजा के बाद पत्रकारों से बातचीत में राज्य की शहरी विकास एवं नगर मामलों की मंत्री अग्निमित्रा पाल ने तृणमूल कांग्रेस, पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सांसद अभिषेक बनर्जी पर एक के बाद एक तीखे तंज कसे।अभिषेक बनर्जी को लेकर ममता बनर्जी द्वारा दिए गए “बाघ की तरह लड़ाई लड़ने” वाले बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अग्निमित्रा पाल ने सवाल दागा, “आखिर यह कौन सा बाघ है? बीरभूम का बाघ या कालीघाट का बाघ?” उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि राज्य में अब बाघों की भरमार हो गई है और जनता की सुरक्षा के लिए ऐसे बाघों को पिंजरे में बंद कर देना चाहिए या जंगल भेज देना चाहिए, क्योंकि उनकी असली जगह वहीं है।














मंत्री ने आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों से ये तथाकथित ‘बाघ’ आम लोगों को नुकसान पहुंचाने और समाज को निगलने का काम कर रहे हैं। उन्होंने गाड़ियों के बोनट पर खड़े होकर धमकी देने की राजनीति पर भी कटाक्ष किया और कहा कि ऐसे नेताओं को सुंदरबन या गिर के जंगलों में छोड़ आना चाहिए। इसी दौरान उन्होंने बीरभूम के तृणमूल नेता अनुब्रत मंडल पर भी निशाना साधते हुए कहा कि जो कभी खुद को ‘बाघ’ कहलवाते थे, वे आज पिंजरे में बंद होकर ‘म्याऊं-म्याऊं’ कर रहे हैं।
यहीं नहीं, अग्निमित्रा पाल ने 21 जुलाई को होने वाली तृणमूल कांग्रेस की शहीद दिवस सभा को लेकर भी ममता बनर्जी पर तंज कसा। उन्होंने कोलकाता हाईकोर्ट द्वारा सभा में अधिकतम ढाई हजार लोगों की उपस्थिति की शर्त लगाए जाने पर कहा कि करोड़ों सदस्यों वाली पार्टी के लिए इतनी छोटी सभा शोभा नहीं देती। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में सलाह दी कि तृणमूल को किसी छोटे स्थान के बजाय ब्रिगेड परेड ग्राउंड में सभा करनी चाहिए।मंत्री ने ममता बनर्जी को अदालत के इस फैसले के खिलाफ आंदोलन करने की भी ‘सलाह’ दी।
साथ ही उन्होंने 21 जुलाई की पुरानी घटना का जिक्र करते हुए कहा कि इस मामले की जांच के लिए गठित आयोग और विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट का पिछले 15 वर्षों से कोई अता-पता नहीं है। उन्होंने मांग की कि तृणमूल नेतृत्व को वह रिपोर्ट तत्काल सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि लोगों को सच्चाई पता चल सके।गौरतलब है कि 21 जुलाई की सभा के लिए अनुमति नहीं मिलने पर ममता बनर्जी ने कोलकाता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के बाद अदालत ने कुछ शर्तों के साथ सभा आयोजित करने की अनुमति दी है। लेकिन अब इस मुद्दे पर शुरू हुई राजनीतिक बयानबाजी ने बंगाल की राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया है।

