“कविता का सिंहासन से संग्राम नहीं रुकने दूंगा” : दुर्गेश नागी
“कविता का सिंहासन से संग्राम नहीं रुकने दूंगा” पत्र के बाद अब कविता से सरकार के समक्ष जनमानस की बातों को उठाते दुर्गेश नागी।













“कविता का सिंहासन से संग्राम नहीं रुकने दूंगा” — अब जनता की आवाज़ बनेगी कविता
कविता का सिंहासन से संग्राम नहीं रुकने दूंगा’ पत्र के माध्यम से अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता व्यक्त करने के बाद अब दुर्गेश नागी अपनी कविताओं के जरिए सरकार के समक्ष जनमानस की समस्याएँ, अपेक्षाएँ और भावनाएँ रखने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
उनका मानना है कि कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और लोकतंत्र में जनभावनाओं को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम भी है। उनकी प्रत्येक रचना का उद्देश्य जनता से जुड़े मुद्दों को रचनात्मक और सार्थक ढंग से सामने लाना है।

दुर्गेश नागी ने कहा—
“मेरी कलम किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि जनहित के पक्ष में चलेगी। जहाँ जनता की पीड़ा होगी, वहाँ मेरी कविता बोलेगी। जहाँ आशा होगी, वहाँ मेरी कविता प्रेरणा बनेगी।”
यह काव्य-यात्रा किसी दल या व्यक्ति के प्रति कटुता का नहीं, बल्कि जनहित, उत्तरदायित्व और सकारात्मक परिवर्तन के लिए संवाद का प्रयास है। आने वाले समय में वे शिक्षा, रोजगार, किसानों, युवाओं, महिलाओं, सामाजिक न्याय, स्थानीय समस्याओं और जनहित से जुड़े अनेक विषयों पर अपनी कविताओं के माध्यम से जनता की आवाज़ बुलंद करेंगे।”जब तक जनमानस की आवाज़ को उचित स्थान नहीं मिलेगा, तब तक मेरी कलम रुकने वाली नहीं है।”
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