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ASANSOL

प्रेमचंद जयंती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में सामाजिक सरोकारों पर हुआ गंभीर विमर्श

* बंगाल मिरर , आसनसोल:*महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर 2 अगस्त 2026 को आसनसोल हिंदी गवेषक संघ एवं आस्था के संयुक्त तत्त्वावधान में (डी.ए.वी.) हायर सेकेंडरी स्कूल, आसनसोल में “सामाजिक सरोकार और प्रेमचंद का साहित्य” विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों ,महाविद्यालयों, विद्यालयों, शैक्षणिक संस्थाओं एवं सामाजिक संगठन से आए विद्वानों ने प्रेमचंद के साहित्य की सामाजिक प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए।कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विश्वविद्यालय, हावड़ा के पूर्व कुलपति प्रो. दामोदर मिश्र ने की।

मुख्य वक्ता के रूप में वेस्ट बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी, बारासात के प्रो. अरुण होता तथा गुरु नानक महाविद्यालय, धनबाद के डॉ. सोनू यादव थें । कार्यक्रम का विषय-प्रवर्तन आस्था के संयोजक श्री नवीन चंद्र सिंह ने किया। उन्होंने प्रेमचंद के साहित्य में निहित मानवीय मूल्यों, सामाजिक चेतना और समकालीन संदर्भों पर प्रकाश डाला। प्रमुख वक्ता डॉ. सोनू यादव ने अपने व्याख्यान में कहा कि प्रेमचंद का साहित्य समाज के वंचित, शोषित और पीड़ित वर्ग की आवाज़ है तथा आज भी सामाजिक परिवर्तन की दिशा में प्रेरणा प्रदान करता है।

उनका धनपत राय से प्रेमचन्द की यात्रा सहज नहीं था। अपने रचना में प्रेमचन्द आज भी कालजयी है। उनके स्त्री पात्र, दलित पात्र, किसान पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करता हैं। डॉ. यादव ने प्रेमचन्द के उपन्यासों, कहानियों, उनकी जीवनी आदि का हवाला देते हुए उनकी रचना धार्मिता एवं प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।मुख्य वक्ता के रूप में आलोचक एवं साहित्य मर्मज्ञ प्रो. अरुण होता ने अपने व्याख्यान में कहा कि- हर रचनाकार की सफलता उनकी अप्रासंगिकता में है।

जिन समस्याओं से रचनाकार जूझता है उसे पाटना आवश्यक है जब तक समस्याएं खत्म नहीं होती है वह प्रासंगिक बने रहते है। आगे उन्होंने कहा एक राजनीतिज्ञ और एक साहित्यकार के लिये स्वतंत्रता के मायने भिन्न है। राजनीतिज्ञ सत्ता पलटने को आजादी कहते है पर साहित्यकार जॉन की जगह गोविन्द को सत्ता में बैठाने को आजादी स्वीकार नहीं करते।

साहित्यकार हर प्रकार के शोषण, असमानता, भेद – भाव से मुक्ति को आजादी के दायरे में लाते हैं। प्रो. होता ने प्रेमचन्द की परंपराओं के कथाकार और प्रेमचन्द के मायने को अपने व्याख्यान में प्रस्तुत किया। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि लमही के बाद आसनसोल में प्रेमचन्द की मूर्ति लगी। फिर बर्नपुर में प्रेमचन्द की मूर्ति लगी।

उन्होंने रानीगंज में हुए राहुल सांकृत्यायन के मूर्ति के क्षति होने की गंभीर रूप से आलोचना एवं चिंता प्रकट की, डॉ. मिश्र ने प्रेमचन्द के साहित्य और आज के संदर्भ में उनका मूल्यांकन किया। कार्यक्रम का सफल संचालन आसनसोल हिंदी गवेषक संघ के सचिव डॉ. विजेंद्र कुमार ने किया।

अंत में रानीगंज टी.डी.बी. कॉलेज के डॉ. शेख आलम ने दिया।संगोष्ठी में गवेषक संघ के अध्यक्ष डॉ बिजय रवानी,सृजय, महावीर राजी,डॉ. प्रमोद कुमार प्रसाद, सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षक मनोज यादव, सामाजिक कार्यकर्ता सिंटू भुईयां, डॉ. बिजय प्रसाद, डॉ. संजय, डॉ. ललिता महतो, डॉ. प्रीति, डॉ. मंजू, डॉ. बीरू रजक सहित अनेक शिक्षकों, शोधार्थियों, साहित्यकारों और साहित्य-प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

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